Bond vs Debenture

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जब कभी भी किसी कंपनी को पैसों की जरूरत होती है, तो उसके पास फंड जमा करने के दो ऑप्शन होते हैं, एक होता है, इक्विटी और दूसरा डेट। इक्विटी में रिस्क कैपिटल है, जिसके अंदर की कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स में शेयर्स को डाइल्यूट कर देती है। मतलब की यदि कंपनी के पास 100 शेयर्स हैं और कंपनी को पैसों की जरूरत पड़े तो कंपनी अपना कुछ % शेयर्स अपने शेयरहोल्डर्स को बेच देती है। उस पैसे को कंपनी अपने बिजनेस में लगा देते हैं। और उस कंपनी में तब वह शेयरहोल्डर भी उतने % का हकदार बन जाते हैं। और दूसरा ऑप्शन कंपनी के पास यह होता है, कि यदि कंपनी अपने शेयर्स को सेल नही करना चाहती तो तब वह डेट फाइनेंशियल ले सकते हैं। डेट फाइनेंशियल का यह फायदा है, कि कंपनी को बैंक से लोन मिल जाता है। यदि कंपनी बैंक से लोन भी नही लेना चाहती है, तो कंपनी के पास एक ऑप्शन यह होता है, कि वह बॉन्ड्स और डिबेंचर इश्यू करें। जिसमे की पब्लिक से पैसे लिए जाते हैं। यह ठीक उसी तरीके की प्रोसेस होती है, जैसे की बैंक से लोन लेना। परंतु इसमें होता यह है, कि कंपनी को एक फिक्स इंटरेस्ट रेट अपने बॉन्ड्स या डिबेंचर होल्डर को दिया जाता है। लेकिन बहुत से लोग बॉन्ड्स और डिबेंचर में कन्फ्यूज हुए रहते हैं, कि आखिर ये दोनो एक दूसरे से कैसे अलग हैं। वैसे देखा जाए तो यह सिमिलर ही हैं। परंतु कुछ डिफरेंस भी हैं, जिनकी वजह से दोनो एक दूसरे से अलग हैं।

बॉन्ड्स और डिबेंचर की समानता –
(i)– बॉन्ड्स और डिबेंचर दोनो ही कंपनी या फिर ऑर्गेनाइजेशन के लिए लॉन्ग टर्म फाइनेंस का,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

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